बच्चों को मोबाइल के दुष्प्रभाव के बारे में किया जा रहा जागरूक
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चूरू जिले के बच्चे वीडियो गेम, यूट्यूब के लिए घंटों मोबाइल पर बीता रहे है। इन सब के बीच अब उसके दुष्प्रभावों पर जागरूकता फैलाने के लिए चूरू में प्रशासन अलर्ट मॉड पर है।
30 अक्टूबर,चूरू। बच्चों के हाथों में किताबों और खिलौनों की जगह अब मोबाइल फोन नजर आने लगे हैं। वीडियो गेम, यूट्यूब और सोशल मीडिया की दुनिया में बच्चे घंटों समय बिता रहे हैं। मोबाइल की यह बढ़ती लत अब बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। बच्चों पर इसके दुष्प्रभावों को देखते हुए चूरू में प्रशासन अलर्ट मोड पर आ गया है। स्कूलों में प्रार्थना सभा के दौरान बच्चों को मोबाइल के सीमित इस्तेमाल और इसके नुकसान के बारे में जागरूक किया जा रहा है। चिकित्सकों का कहना है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों की आंखों, नींद, एकाग्रता और व्यवहार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। ऑनलाइन गेमिंग, यूट्यूब वीडियो और मनोरंजन के दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म बच्चों को घंटों स्क्रीन के सामने बैठाए रख रहे हैं। कई बच्चे पढ़ाई और खेलकूद के समय में भी मोबाइल को प्राथमिकता देने लगे हैं। बच्चों में बढ़ती इस आदत को लेकर अब चूरू प्रशासन और शिक्षा विभाग ने जागरूकता की पहल शुरू की है।
जिले के स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान विद्यार्थियों को मोबाइल के अधिक इस्तेमाल से होने वाले नुकसान बताए जा रहे हैं। बच्चों को समझाया जा रहा है कि मोबाइल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल उनकी पढ़ाई, स्वास्थ्य और दैनिक जीवन को प्रभावित कर सकता है।
मोबाइल की लत का सबसे ज्यादा असर बच्चों की आंखों पर देखने को मिल रहा है। चूरू के राजकीय आई हॉस्पिटल और मेडिकल कॉलेज से जुड़े चिकित्सकों के अनुसार, लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में सूखापन, जलन, चुभन और बार-बार पलकें झपकाने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, लगातार छोटी स्क्रीन पर नजरें टिकाए रखने और मोबाइल को आंखों के बेहद करीब रखकर देखने से आंखों पर दबाव बढ़ता है।
बच्चों में नजर कमजोर होने और कम उम्र में चश्मे की जरूरत पड़ने की समस्या भी चिंता का विषय बन रही है। चिकित्सकों के अनुसार, जो बच्चे प्रतिदिन पांच से छह घंटे तक मोबाइल देखते हैं, उनमें आंखों से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करना बेहद जरूरी है।
मोबाइल का अधिक इस्तेमाल केवल आंखों को ही प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि बच्चों की नींद और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल रहा है। मनोचिकित्सक डॉ. जितेंद्र सिंह के अनुसार, मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर में नींद को नियंत्रित करने वाले हार्मोन मेलाटोनिन के स्राव को प्रभावित कर सकती है। इसका असर बच्चों की नींद के चक्र पर पड़ता है। देर रात तक मोबाइल देखने वाले बच्चों को समय पर नींद नहीं आने और सुबह उठने में परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। पर्याप्त नींद नहीं मिलने से उनकी दिनचर्या, पढ़ाई और एकाग्रता भी प्रभावित हो सकती है।
बच्चों में लगातार बढ़ता स्क्रीन टाइम उनके मानसिक और सामाजिक विकास के लिए भी चिंता का विषय है। चिकित्सकों के मुताबिक, जरूरत से ज्यादा मोबाइल और सोशल मीडिया का इस्तेमाल बच्चों की एकाग्रता, याददाश्त और सीखने की क्षमता पर असर डाल सकता है।
वहीं, लंबे समय तक गेमिंग और वीडियो देखने की आदत के कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन, बेचैनी, गुस्सा और अकेले रहने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। कई बार मोबाइल नहीं मिलने पर बच्चे जिद करने लगते हैं और उनका व्यवहार भी बदलने लगता है।
इसके अलावा ऑनलाइन गेम और यूट्यूब पर दिखाए जाने वाले खतरनाक चैलेंज भी बच्चों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर रहे हैं। कुछ बच्चे वीडियो में दिखाए गए स्टंट और खतरनाक गतिविधियों को वास्तविक जीवन में दोहराने की कोशिश करते हैं, जिससे दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।
बच्चों को मोबाइल की इस बढ़ती निर्भरता से दूर रखने के लिए अब अभिभावकों की भूमिका भी अहम हो गई है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि माता-पिता बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल का समय तय करें और सोने से पहले मोबाइल से दूरी बनाए रखने की आदत विकसित करवाएं।
इसके साथ ही बच्चों को आउटडोर गेम्स, खेलकूद, किताबें पढ़ने और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना जरूरी है। अभिभावकों को भी बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए, ताकि उनका रुझान मोबाइल की बजाय वास्तविक सामाजिक गतिविधियों की ओर बढ़े।
कुल मिलाकर, मोबाइल और डिजिटल प्लेटफॉर्म का बढ़ता इस्तेमाल बच्चों के स्वास्थ्य और भविष्य को लेकर नई चुनौती बनता जा रहा है। चूरू में प्रशासन की स्कूलों के माध्यम से शुरू की गई जागरूकता पहल इसी दिशा में एक कदम है।
जरूरत इस बात की है कि स्कूल, अभिभावक और चिकित्सा विशेषज्ञ मिलकर बच्चों को मोबाइल का संतुलित इस्तेमाल करना सिखाएं। क्योंकि तकनीक बच्चों के ज्ञान और विकास का माध्यम बने, न कि उनके बचपन, स्वास्थ्य और खेलकूद की जगह ले ले।
बाइट डॉ लक्ष्मी, सहायक आचार्या मनोरोग विभाग, राजकीय मेडिकल कॉलेज चूरू
बाइट डॉ सुनील झाझडिया , नेत्र चिकित्सक, राजकीय नेत्र अस्पताल चूरू
बाइट डॉ लक्ष्मी शर्मा शिक्षाविद चूरू बाइट विवेक शर्मा परिजन